बचपन से अभी कुछ िदन पेहले तक मैं अकेला था। और अब अचानक मैं complete होगया हू। रुकमनी के आने से। रुकमनी यानी मेरी पत्नी। यानी िजसिक खुशी की परवाह मुझे अपने से पेहले होनी चिहये, ऐसा मेरा मन्ना है। खैर, मेरी शािद एक अभूतपूरव्व अनुभव था मेरे िलये और मेरे क इ ऐसे लोगों के िलये जो मुझे बहुत पसंद करते है। मैं िज़ंदगी मे इस बात के िलये हमेशा भगवान को धन्यवाद देता हू िक मैं उतने लोगों को शायद प्यार नही दे पाया िजतना की मुझे लोगो से िमला है। और हर वो शखस् िजसने मुझे िज़ंदगी मैं किभ ना किभ थोडा सा िभ प्यार िकया है वो वहां मेरे इस जीवन के नये मोड मे शािमल था। जो निह आ पाया इसका मतलब ये नही िक वो मुझे कम प्यार करता था लेिकन मजबूिर ने निह आने िदया इसिलये उनका िभ धन्यवाद है। ये शािद मेिर कम और मेरे िपता जी के पुत्र िक शािद ज़्यादा थी, इसिलये अगर मैं ये कहू िक मेिर शािद मे देखो ये हुआ वोह हुआ तो वो मेिर बेवकूिफ़ होगी। मैं भी उस शािद का उतना ही बडा पत्र था िजतने सब थे, खुशिकसमित से मेरे चेहरे पर िसर्फ़ एक तमगा जुडा हुआ था "दुलहा"। मेरे चेहरे पर हल्दी और सरसौ लगा लगा के वो असम्भव कायृ िकया जा रहा था जो भगवान िभ नही कर पाये आज तक। मेरे सांवले पन को, िजसे मैं सांवला अपना िदल रखने के िलये केहता हू, को छुपने के िलये मशक्कत जािर थी। सुबह शाम एक आदिम िसर्फ़ इिस काम मे लगा था। लेिकन अफ़सोस मुझे हमेशा इस बात का रहेगा िक मुझे "दुलहे" जैिस तवज्जौ इस िलये निह िमल पािय क्युकी मैं घर मे सबसे छोटा हू। और सब गाहे बगहे अपना रौब मारने से बाज नही आते। सारे बडे है तो िजसका जब मन करता है वो आके अपना रौब मुझ पर झाड लेता है। लेिकन ये क्या मै तो "दुलहा" हू, अब क्या करे, लोग रौब िकस पर झाडेंगे, मेरे दुलहा होने के बावजूद मुझसे काम कराये गये। और जैसे ही मैं दुलहा बन्ने का राग अलापता तुरंत िपतािज िक ठेढी नज़रे पडती, और मा की डपट "बहुत दुलहा बने हुए हो? दो झापड पडते ही औकात मे आजाओगे" बस ये केहने की देर होती और मैं वकपस भीगा दुलहा। खैर, मैं शािद से कुछ िदन पेहले ही घर पहुच चुका था, पेहले शािद का कोइ िभ अनुभव ना होने के कारन मुझे ये एहसास नही था िक मैं घर जल्िद आया हू या देर से, लेिकन मैं लगभग 15 िदन पेहले पहुच ही गया। अिभ तक पेहला guest अपिन शािद का मैं ही था, मेरे बाद ही बािक सब का िभ आगमन होना था। अब शुरु हुइ मेरे खुद िक शािद िक तैयािरयौं का मुआयेना करने िक बािर, लेिकन अफ़सोस मैं मुआयना नही कर सकता था कयौिक तयािर िपता िज करा रहे थे। अब उनके आगे कौन बताये िक िपता िज मुझे ये कत्ए पसंद नही, कयौिक शािद मेिर नही थी, िपता िज के बेटे िक थी। कयौ भूल जाता हू मैं। लेिकन एक बात मे मैं गधे िक तरह अड गया िक मैं घोडे वािल बग्िग मे निह बैठूंगा, मैने ना नुकुर का मेला लगा िदया, िक चाहे धरित फ़ट जाये और िहमालय आग उगलने लगे मैं घोडे वािल बग्िग मे नही बैठूंगा। मुझे हर तरफ़ से मनाया गया, पुचकारा गया, िहलाया गया, उकसाया गया लेिकन मैं ना माना, मैं एक उल्लु िक तरह बग्िग िक सवािर नही करना चाहता था। वैसे मेरे "ये िभ नही करूगा" िक िलस्ट मे कयी चीज़े थी, जो मुझे पता था िक मुझे नही करिन है चाहे कुछ िभ हो जाये। लेिकन अफ़सोस मुझे ना िसरफ़ वोह िलस्ट मे छपी सब चीज़े करिन पडी, बल्की उस्से िभ ज़यादा । घोडी से उतर के धीरे धीरे stage िक ओर जाना भी मेिर िलस्ट मे शुमार था। दुलहो से कयी चीज़े लोग अनायास ही उम्मीद कर बैठ ते है, जैसे दुलहा ज़यादा खुश ना लगे, उसको हर काम धीरे धीरे करना है, वो हमेशा tensed िदखना चिहये, वो सभ्भया िदखना चिहये। लोग तो अपना मजे लेके पकवान उडा के िनकल जाते है पर दुलहे का क्या, वो ठीक से खाना िभ नही खा सकता। लेिकन मैने अपिन तरफ़ से सारे िनयम तोडने िक नाकाम कोिशश िक, मैने भर पेट खाना दबाया, बल्िक एक निह दो दो मीठा िनगला, िबवी और मैने एक ही थािल मे खाया पर वो िसरफ़ अचँिभत मुझे देखती रही िक ये इतना भुक्कड दुलहा उसने िभ अपने जीवन में नही देखा होगा। मैं धीरे धीरे स्टेज िक ओर ना चलके, मजे मजे मे हाथ िहलाते चला, और तो और घुसते ही नाचा िभ, लोगौ ने नज़रे टेढ़ी िक िकतना फ़ूहड दुलहा है, पर मैं कयौ ना नाचू मेिर शािद है। मैने स्टेज पर चढ़ कर अपने दोसतो के साथ हाथ पीट पीट कर ठहाके लगाये, शायद मैं असभ्य दुलहो िक िलस्ट मे शुमार हुआ हूंगा पर क्या करू मेिर िभ पेहिल ही शािद थी। अकसर दुलहे को एक हसी का पात्र माना गया है। मैं िभ था। िजस गिल गुज़रता कोइ ना कोइ आदिम फ़बित कस देता। “और भाइ बटना लग गया?”, हा भाइ गुड्डु मेहंिद लग गिय”, जैसे दुिनया मे मैं अकेला प्रानी हू िजसने शािद िक कसम खा िल है। क इ तो मुझे जानते िभ निह थे। कयौिक इतना मोटा दुलहा और वो िभ पके बाल वाला उनहोने पेहिल बार ही देखा होगा। एक िरशतेदार आये जो मुझसे लगभग 20 साल बाद िमल रहे थे, मुझ ही से पूछ बैठे िक “गुड्डु से िमले?” मैने "ना" मे सर िहला िदया, वो मेरे बगल मे आके बैठ गये और पूछ ने लगे “आप भैनसासुर गावँ से है ना?” मैने तुरन्त हा केह िदया, वो मान गये और उनहोने मुझे बताया गुड्डु उनके िकतना करीब है और उनसे पूछे बगैर पत्ता तक नही िहलाता। बेहरहाल गुड्डू मेरा ही नाम है िजसिक शािद िथ। जब इन महान िरशतेदार ने मुझे सिभ रीित िरवाज़ पूरे करते देखा तो उनहे शक हुआ और जब देखा िक मैं घोिड पर िभ चढने ही वाला हू तो दौडे और िचल्लाये “अरे गुड्डु पेहचाने नही क्या…।।” तब तक बरात चल पिड थी।
जारी;;;;

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