8.06.2009

िलखने िक तडप

अक्सर एक लेखक मे ही ये बीमारी अवित्रत होती है। या तो बैठा सुबह से शाम कलम और कागज़ को एक रंग मैं सराबोरे करने बैठ जाता है या महीनो और सालो छोड़ देता है कागज़ो को रोता िबलखता। कुछ यू ही मेरे साथ िभ हुआ है। काफी सालो से िदमािग कुशती के चलते कुछ िलख ही नही पाया। अब वापस लौटा हू, जो शब्द िदमाग मैं बस के अब कमज़ोर पड़ चुके है उनको वापस जीिवत करने। धीरे धीरे शायद आसान हो जाये उनका बाहर आना। जो अिभ शरमाते सकुचाते बैठे हुए है िकिस कोने मैं

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