4.13.2012
निर्मल बाबा को हमने बनाया, वह अवतरित नहीं हुए
भुट्टे को खाकर या खिलाकर अपने जीवन को संवार, जा गरीबों मैं डोसा और इडली बाँट आ. निर्मल बाबा के तरीको पर पूरे देश मैं चर्चा हो रही है. पर ये चर्चा जिस मुकाम पर पहुच चुकी है वह यही दर्शाता है की निर्मल बाबा ने आखिर ग़लत किया क्या? किसी को बन्दूक की नोक पैर समागम मैं बुलाया नहीं, किसी को वशीभूत कर टीवी के आगे बिठाया नहीं, किसी की जेब नहीं काटी किसी को जबरदस्ती लूटा नहीं. उन्होंने तोह सिर्फ हम सब के खोते आत्मविश्वास का फायेदा मात्र उठाया. इसमें उनकी ग़लती क्या है? इसमें तोह हमारी ग़लती है और हमारे समाज का दोष है. हम ही ने तोह उन्हें भगवान् बना दिया, उनकी फालतू बातों को तवज्जौ देके.
निर्मल बाबा क्योँ सही हैं इसे जानी के लिए हमें थोडा आत्म चिंतन कर लेना चाहिए. जिस देश मैं प्रमुख चिंता का विषय "अस्स्मान से लौटा बौना हो" या जिस देश के प्रमुख टीवी चनेलोउन पर खामखा की चर्चा इस बात पर हो की शारुख को अमरीका ने एअरपोर्ट पर क्योँ सुरक्षा जांच के नाम पर पकडे रक्खा उस देश से आप क्या उम्मीद रखते हैं?
आज सभी न्यूज़ चैनल इस बात को साबित करने लगे हैं की निर्मल बाबा कितने पाखंडी हैं. क्या ये बात उन्हें तब नहीं पता लगी जब वोह अपना विज्ञापन उन्हीं टीवी चैनल पर दिखने के लिए पैसे देने पहुचें होंगे. और इस सब बात के बावजूद जब न्यूज़ ख़त्म होती है तोह विज्ञापन फिर निर्मल बाबा का आजाता है. कहीं ये टीवी चैनल और बाबा की ही मिलीभगत तोह नहीं? कई टीवी चैनल ये भी कह रहे हैं की वोह बाबा की बाटूँ से इत्तफाक नहीं रखते और १२ may से इन विग्यपनौन को बंद करदेंगे. एक महीने बाद क्योँ? अभी क्योँ नहीं?
असल मैं इस देश को आदत पड़ गयी है वख्त जाया करने की. निर्मल बाबा कोई मुद्दा नहीं है चर्चा का, उसे मुद्दा बनाया जा रहा है, ताकि हम अहम् मुद्दौं के बारे मैं गौर करें ही नहीं. ताकि कुच्छ लोग इस बात का फायेदा उठा पायें. पहले कश्मीर को मुद्दा बना कर, फिर और छोटे छोटे मुद्दे पैदा करके.
हमको आज सही मैं निर्मल बाबा की ज़रुरत है, क्यूंकि हम बेवक़ूफ़ हैं और भुट्टे और दोसे खिला कर भी हमें कोई भी बेवक़ूफ़ बना सकता है. मीडिया का सिर्चुस सुबह से शाम चलता रहता है, उसे देख देख कर हम मजे करते हैं, आई पि एल क्रिकेट देखते हैं , सास बहु का ड्रामा देखते हैं, एक दुसरे को गाली देते हैं, सो जाते हैं. और यही हम करते रहेंगे. नूपुर तलवार को सी बी आई ढूंढती रहेगी, वोह चुपचाप कोर्ट मैं जाकर जमानत लेलेंगी, आरुशी का केस कभी सोल्वे नहीं हो पायेगा, जेस्सिका को फिर कोई गोली मार देगा, राम गोपाल वर्मा उसपर फिल्म बना देगा, फिर कोई निर्मल बाबा आके जनता को नोचेगा, हम भी नुचवाते रहेंगे, टीवी चैनल कभी रोबेर्ट वढेरा का सच जनता को नहीं बताएगी, सिर्फ प्रिंस को गड्ढे मैं गिराने की खबर हमको रटाती रहेगी, हम खुश रहेंगे
लेकिन हमारी आने वाली नस्ल हमें कभी माफ़ नहीं करेगी.
11.16.2010
Jaage TaTa bole manga pandreh karod rupaiya
Media aur minister naachen karte tata thaiya
Kahe mantri tabhi udega Tata udan khatola
Jab aayega bhar ke ghar pe notoun ka ek jhola
Mukre Tata bole rishwat deke ijjat kabhi na gawaunga
Udan khatola gaya bhaad main meethi neend so jaunga
Kahe “afeeem” Tata ji aap dashak baad kyoun jaage?
Keh dete us wakht minister firta bhaage bhaage
"afeeem"
Media aur minister naachen karte tata thaiya
Kahe mantri tabhi udega Tata udan khatola
Jab aayega bhar ke ghar pe notoun ka ek jhola
Mukre Tata bole rishwat deke ijjat kabhi na gawaunga
Udan khatola gaya bhaad main meethi neend so jaunga
Kahe “afeeem” Tata ji aap dashak baad kyoun jaage?
Keh dete us wakht minister firta bhaage bhaage
"afeeem"
9.26.2010
खेल को झेल
कहीं साँप निकला, कहीं बिस्तर टूटा.
कहीं पान पीका, कहीं बेसिन फूटा .
इस खेल मे, कई करोर फूँके.
लाखो चबा के निकले, देखो ये कितने भूखे.
"अफ़ीम" रोए देख के, अपने 'शेरू' की हालत.
जंगल मे मिली इज़्ज़त, और शहर मे जलालत.
देश-ए-इज़्ज़त की खातिर, काश लालच छोर देते.
गुब्बारा खरीदा ठीक था, नारियल भी फोड़ देते
"अफ़ीम"
कहीं पान पीका, कहीं बेसिन फूटा .
इस खेल मे, कई करोर फूँके.
लाखो चबा के निकले, देखो ये कितने भूखे.
"अफ़ीम" रोए देख के, अपने 'शेरू' की हालत.
जंगल मे मिली इज़्ज़त, और शहर मे जलालत.
देश-ए-इज़्ज़त की खातिर, काश लालच छोर देते.
गुब्बारा खरीदा ठीक था, नारियल भी फोड़ देते
"अफ़ीम"
9.17.2010
Shabd
सुशील कुमार संग फोटू खिचाने पहुचे मिस्टर गिल
फोटो तो खीची नही पर तोड़ा गुरु का दिल
तोड़ा गुरु का दिल धक्का मुक्की कर उन्हें भगाया
उसी द्रौंन को जिसने ये पहलवान बनाया
कहे "अफ़ीम" गिल साहब को भी, कोई कोच दिलाए
गुरु की गारीमा पढ़ाए और तमीज़ सिखाए.
"अफ़ीम"
होगा खेल कॉमन वेल्थ का, थम जाएगी दिल्ली!
अपने खुद के शहर में होंगे, जैसे भीगी बिल्ली !!
होंगे भीगी बिल्ली, दस दिन में, काया कल्प हो जाएगा
हर नेता हर अफ़सर बाद में, अपना बिगुल बजाएगा
कहे "अफ़ीम" ये प्लेयर्स खेल के वापस मुल्क को जाएँगे
पर हम भीगे दिल्ली वाले फिर से अनाथ हो जाएँगे !!!!
"अफ़ीम"
फोटो तो खीची नही पर तोड़ा गुरु का दिल
तोड़ा गुरु का दिल धक्का मुक्की कर उन्हें भगाया
उसी द्रौंन को जिसने ये पहलवान बनाया
कहे "अफ़ीम" गिल साहब को भी, कोई कोच दिलाए
गुरु की गारीमा पढ़ाए और तमीज़ सिखाए.
"अफ़ीम"
होगा खेल कॉमन वेल्थ का, थम जाएगी दिल्ली!
अपने खुद के शहर में होंगे, जैसे भीगी बिल्ली !!
होंगे भीगी बिल्ली, दस दिन में, काया कल्प हो जाएगा
हर नेता हर अफ़सर बाद में, अपना बिगुल बजाएगा
कहे "अफ़ीम" ये प्लेयर्स खेल के वापस मुल्क को जाएँगे
पर हम भीगे दिल्ली वाले फिर से अनाथ हो जाएँगे !!!!
"अफ़ीम"
8.07.2009
एक दुलहे िक डायरी
बचपन से अभी कुछ िदन पेहले तक मैं अकेला था। और अब अचानक मैं complete होगया हू। रुकमनी के आने से। रुकमनी यानी मेरी पत्नी। यानी िजसिक खुशी की परवाह मुझे अपने से पेहले होनी चिहये, ऐसा मेरा मन्ना है। खैर, मेरी शािद एक अभूतपूरव्व अनुभव था मेरे िलये और मेरे क इ ऐसे लोगों के िलये जो मुझे बहुत पसंद करते है। मैं िज़ंदगी मे इस बात के िलये हमेशा भगवान को धन्यवाद देता हू िक मैं उतने लोगों को शायद प्यार नही दे पाया िजतना की मुझे लोगो से िमला है। और हर वो शखस् िजसने मुझे िज़ंदगी मैं किभ ना किभ थोडा सा िभ प्यार िकया है वो वहां मेरे इस जीवन के नये मोड मे शािमल था। जो निह आ पाया इसका मतलब ये नही िक वो मुझे कम प्यार करता था लेिकन मजबूिर ने निह आने िदया इसिलये उनका िभ धन्यवाद है। ये शािद मेिर कम और मेरे िपता जी के पुत्र िक शािद ज़्यादा थी, इसिलये अगर मैं ये कहू िक मेिर शािद मे देखो ये हुआ वोह हुआ तो वो मेिर बेवकूिफ़ होगी। मैं भी उस शािद का उतना ही बडा पत्र था िजतने सब थे, खुशिकसमित से मेरे चेहरे पर िसर्फ़ एक तमगा जुडा हुआ था "दुलहा"। मेरे चेहरे पर हल्दी और सरसौ लगा लगा के वो असम्भव कायृ िकया जा रहा था जो भगवान िभ नही कर पाये आज तक। मेरे सांवले पन को, िजसे मैं सांवला अपना िदल रखने के िलये केहता हू, को छुपने के िलये मशक्कत जािर थी। सुबह शाम एक आदिम िसर्फ़ इिस काम मे लगा था। लेिकन अफ़सोस मुझे हमेशा इस बात का रहेगा िक मुझे "दुलहे" जैिस तवज्जौ इस िलये निह िमल पािय क्युकी मैं घर मे सबसे छोटा हू। और सब गाहे बगहे अपना रौब मारने से बाज नही आते। सारे बडे है तो िजसका जब मन करता है वो आके अपना रौब मुझ पर झाड लेता है। लेिकन ये क्या मै तो "दुलहा" हू, अब क्या करे, लोग रौब िकस पर झाडेंगे, मेरे दुलहा होने के बावजूद मुझसे काम कराये गये। और जैसे ही मैं दुलहा बन्ने का राग अलापता तुरंत िपतािज िक ठेढी नज़रे पडती, और मा की डपट "बहुत दुलहा बने हुए हो? दो झापड पडते ही औकात मे आजाओगे" बस ये केहने की देर होती और मैं वकपस भीगा दुलहा। खैर, मैं शािद से कुछ िदन पेहले ही घर पहुच चुका था, पेहले शािद का कोइ िभ अनुभव ना होने के कारन मुझे ये एहसास नही था िक मैं घर जल्िद आया हू या देर से, लेिकन मैं लगभग 15 िदन पेहले पहुच ही गया। अिभ तक पेहला guest अपिन शािद का मैं ही था, मेरे बाद ही बािक सब का िभ आगमन होना था। अब शुरु हुइ मेरे खुद िक शािद िक तैयािरयौं का मुआयेना करने िक बािर, लेिकन अफ़सोस मैं मुआयना नही कर सकता था कयौिक तयािर िपता िज करा रहे थे। अब उनके आगे कौन बताये िक िपता िज मुझे ये कत्ए पसंद नही, कयौिक शािद मेिर नही थी, िपता िज के बेटे िक थी। कयौ भूल जाता हू मैं। लेिकन एक बात मे मैं गधे िक तरह अड गया िक मैं घोडे वािल बग्िग मे निह बैठूंगा, मैने ना नुकुर का मेला लगा िदया, िक चाहे धरित फ़ट जाये और िहमालय आग उगलने लगे मैं घोडे वािल बग्िग मे नही बैठूंगा। मुझे हर तरफ़ से मनाया गया, पुचकारा गया, िहलाया गया, उकसाया गया लेिकन मैं ना माना, मैं एक उल्लु िक तरह बग्िग िक सवािर नही करना चाहता था। वैसे मेरे "ये िभ नही करूगा" िक िलस्ट मे कयी चीज़े थी, जो मुझे पता था िक मुझे नही करिन है चाहे कुछ िभ हो जाये। लेिकन अफ़सोस मुझे ना िसरफ़ वोह िलस्ट मे छपी सब चीज़े करिन पडी, बल्की उस्से िभ ज़यादा । घोडी से उतर के धीरे धीरे stage िक ओर जाना भी मेिर िलस्ट मे शुमार था। दुलहो से कयी चीज़े लोग अनायास ही उम्मीद कर बैठ ते है, जैसे दुलहा ज़यादा खुश ना लगे, उसको हर काम धीरे धीरे करना है, वो हमेशा tensed िदखना चिहये, वो सभ्भया िदखना चिहये। लोग तो अपना मजे लेके पकवान उडा के िनकल जाते है पर दुलहे का क्या, वो ठीक से खाना िभ नही खा सकता। लेिकन मैने अपिन तरफ़ से सारे िनयम तोडने िक नाकाम कोिशश िक, मैने भर पेट खाना दबाया, बल्िक एक निह दो दो मीठा िनगला, िबवी और मैने एक ही थािल मे खाया पर वो िसरफ़ अचँिभत मुझे देखती रही िक ये इतना भुक्कड दुलहा उसने िभ अपने जीवन में नही देखा होगा। मैं धीरे धीरे स्टेज िक ओर ना चलके, मजे मजे मे हाथ िहलाते चला, और तो और घुसते ही नाचा िभ, लोगौ ने नज़रे टेढ़ी िक िकतना फ़ूहड दुलहा है, पर मैं कयौ ना नाचू मेिर शािद है। मैने स्टेज पर चढ़ कर अपने दोसतो के साथ हाथ पीट पीट कर ठहाके लगाये, शायद मैं असभ्य दुलहो िक िलस्ट मे शुमार हुआ हूंगा पर क्या करू मेिर िभ पेहिल ही शािद थी। अकसर दुलहे को एक हसी का पात्र माना गया है। मैं िभ था। िजस गिल गुज़रता कोइ ना कोइ आदिम फ़बित कस देता। “और भाइ बटना लग गया?”, हा भाइ गुड्डु मेहंिद लग गिय”, जैसे दुिनया मे मैं अकेला प्रानी हू िजसने शािद िक कसम खा िल है। क इ तो मुझे जानते िभ निह थे। कयौिक इतना मोटा दुलहा और वो िभ पके बाल वाला उनहोने पेहिल बार ही देखा होगा। एक िरशतेदार आये जो मुझसे लगभग 20 साल बाद िमल रहे थे, मुझ ही से पूछ बैठे िक “गुड्डु से िमले?” मैने "ना" मे सर िहला िदया, वो मेरे बगल मे आके बैठ गये और पूछ ने लगे “आप भैनसासुर गावँ से है ना?” मैने तुरन्त हा केह िदया, वो मान गये और उनहोने मुझे बताया गुड्डु उनके िकतना करीब है और उनसे पूछे बगैर पत्ता तक नही िहलाता। बेहरहाल गुड्डू मेरा ही नाम है िजसिक शािद िथ। जब इन महान िरशतेदार ने मुझे सिभ रीित िरवाज़ पूरे करते देखा तो उनहे शक हुआ और जब देखा िक मैं घोिड पर िभ चढने ही वाला हू तो दौडे और िचल्लाये “अरे गुड्डु पेहचाने नही क्या…।।” तब तक बरात चल पिड थी।
जारी;;;;
8.06.2009
िलखने िक तडप
अक्सर एक लेखक मे ही ये बीमारी अवित्रत होती है। या तो बैठा सुबह से शाम कलम और कागज़ को एक रंग मैं सराबोरे करने बैठ जाता है या महीनो और सालो छोड़ देता है कागज़ो को रोता िबलखता। कुछ यू ही मेरे साथ िभ हुआ है। काफी सालो से िदमािग कुशती के चलते कुछ िलख ही नही पाया। अब वापस लौटा हू, जो शब्द िदमाग मैं बस के अब कमज़ोर पड़ चुके है उनको वापस जीिवत करने। धीरे धीरे शायद आसान हो जाये उनका बाहर आना। जो अिभ शरमाते सकुचाते बैठे हुए है िकिस कोने मैं
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