9.26.2010

खेल को झेल

कहीं साँप निकला, कहीं बिस्तर टूटा.
कहीं पान पीका, कहीं बेसिन फूटा .
इस खेल मे, कई करोर फूँके.
लाखो चबा के निकले, देखो ये कितने भूखे.
"अफ़ीम" रोए देख के, अपने 'शेरू' की हालत.
जंगल मे मिली इज़्ज़त, और शहर मे जलालत.
देश-ए-इज़्ज़त की खातिर, काश लालच छोर देते.
गुब्बारा खरीदा ठीक था, नारियल भी फोड़ देते

"अफ़ीम"

7 comments:

  1. हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
    कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें

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  2. ब्लाग जगत की दुनिया में आपका स्वागत है।

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  3. कविता अपनी दिशा की ओर उन्मुख है, किन्तु लोग समझते क्यों नही भाई!!

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  4. welcome excellent photographs

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  5. इस सुंदर से चिट्ठे के साथ हिंदी ब्‍लॉग जगत में आपका स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

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  6. Kaafi saaloun baad apna blog check kiya, aap sab ke comments dikhe. Accha laga. Dhanyawaad. soch raha hoon fir se likhna shuru karooun, koi aur nai na sahi, aap sab toh honge hee mere maan baap aur biwi ke saath. Dhaywad sahit aapka "Afeem"

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